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राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया

August 19, 2020
A2


15 अगस्त 1947 को मिली राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया था। कहा गया था कि अभी आर्थिक आजादी हासिल करना है। पिछले करीब तीन दशकों में आर्थिक गुलामी का तौक गले में डाल कर राजनीतिक आजादी को भी लगभग गंवा दिया गया है।

हर साल शानो-शौकत से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने और देशभक्ति का भारी-भरकम प्रदर्शन करने के बावजूद, लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी नहीं, नवसाम्राज्यवादी गुलामी पूर्णता और मजबूती की ओर बढ़ती जाती है।

नवसाम्राज्यवादी गुलामी का गहरा रंग देखना हो तो कोई भारत आए। यहां कारपारेट पूंजीवाद की गुलामी में पगे नेताओं, खिलाडि़यों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का उत्साह और उमंग देख कर लगता है मानो वे विज्ञापन की दुनिया के मॉडल हों! मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी मंडली ही नहीं, एपीजे अब्दुल कलाम और लालकृष्ण अडवाणी भारत के महाशक्ति बनने के गीत गाते नहीं थकते हैं। अधूरी आजादी का पूरा फायदा उठा कर भारत का शासक-वर्ग कंपनियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है।

इस उमंग भरे माहौल का दबदबा इतना ज्यादा है कि नवउदारवाद-विरोध की लघु-धारा के कतिपय वरिष्ठ आंदोलनकारी और बुद्धिजीवी भी उसकी चपेट में आ जाते हैं। दोबारा पटरी पर आना उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसे में, नवउदारवादी नीतियों के चलते उच्छिष्ट का ढेर बना दी गई विशाल आबादी की दशा समझी सकती है। वह खटती और मरती भी है, और नकल भी करती है। इस तरह पूंजीवाद अपने शासक-वर्ग के साथ-साथ अपनी (गुलाम) जनता भी तैयार करता चलता है।

इस बीच आरएसएस से लेकर गांधीवादी, समाजवादी, मार्क्स वादी आदि सभी राजनीतिक-वैचारिक समूह आजादी पर आने वाले संकट और उसे बचाने की चिंता जता चुके हैं। लेकिन नवसाम्राज्यवाद की ताकत कहिए या आजादी की सच्ची चेतना का अभाव या दोनों, उस चिंता का खोखलापन अथवा कमजोरी जगजाहिर होते देर नहीं लगती।

आजादी बचाने की पुकार उठती है और बुलबुले की तरह फूट जाती है। ऐसा नहीं है कि आजादी को बचाने के सच्चे प्रयास नहीं हुए या अभी नहीं हो रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में शोर ज्यादा मचाया गया है। आजादी को बचाने के लिए ठोस विचार और रणनीति के तहत दीर्घावधि आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। आज की हकीकत यह है कि आजादी बचाने की वास्तविक चिंता करने वाले लोग अब बहुत थोड़े और उपेक्षित हैं।

ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वाधिक गंभीरता और प्राथमिकता से देश के पराधीन होते जाने की परिघटना पर विचार होना चाहिए। उसके बगैर न केवल नवउदारीकरण के दौर में भिखारी बना दी गई जनता के लिए हमारी चिंता का कोई हासिल नहीं है, हमारे प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बौद्धिक कर्म का भी स्वतंत्र अर्थ नहीं रह जाता है। क्रांति के दावों की दयनीयता तो स्वयंसिद्ध है ही।

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