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‘मेरे बाद’ से बेनकाब होते गूढ़ रहस्य

August 12, 2020
Lit1

श्रीकांत सिंह


नोएडा। राहत इंदौरी की एक पुस्तक आई थी—मेरे बाद। उसकी समीक्षा मैंने की थी जो कादंबिनी के मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक राहत इंदौरी के बारे में बहुत कुछ कहती है। अगर आपके पास पुस्तक पढ़ने का समय नहीं है, तो हम वह पुस्तक समीक्षा हूबहू दोबारा पेश कर रहे हैं, जिसमें मशहूर शायर राहत इंदौरी के बारे में बहुत कुछ कहा गया है।

भाव और विचार अमूर्त होते हैं। उनका सूक्ष्म आशय जनसामान्य के लिए गूढ़ होता है, लेकिन यदि शब्दों का उपयोग सटीक स्थान पर किया जाए तो सभी भाव और विचार मूर्त रूप ले लेते हैं और उनका चित्र जनमानस पर स्पष्ट उभरने लगता है। इसी से किसी शब्द सौदागर की सफलता आंकी जाती है। कहा भी गया है-जैसा कि मैं बोलता, वैसा ही तू लिख। फिर भी मेरे साथ में मुझसे बड़ा तू दिख। इस संदर्भ में डॉक्टर राहत इंदौरी एक बड़े नाम हैं जिन्होंने अपनी शायरी के दम पर देश विदेश में शोहरत अर्जित की है।

विषयवस्तु की बात करें तो उनकी लेखनी प्रेम, अध्यात्म, जीवन, यथार्थ, जीवन-मूल्य, नारी-विमर्श, सामाजिक विसंगतियों, रिश्तों, कानून-व्यवस्था, बाजारवाद, धार्मिक आडंबरों, मशीनीकरण, पश्चिम के अंधानुकरण, देश की सियासत, बेकारी और आर्थिक विसंगतियों की खबर लेती नजर आती है। इन विषयों को उन्होंने पूरी संवेदना और ईमानदारी से अपनी शायरी का माध्यम बनाया है। तभी तो वह देश-विदेश में तमाम पुरस्कारों से सम्मानित किए गए हैं। ‘मेरे बाद’ पुस्ताक में उनकी शैली अद्भुत है। एक उदाहरण लेते हैं-

उसकी याद आई है सांसो जरा आहिस्ता चलो,
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।

समाज की विडंबनाओं पर राहत इंदौरी करारा प्रहार करते हैं, लेकिन उनकी व्यंग्यात्मक प्रस्तुति अनायास ही मन मोह लेती है। वह भले ही किसी खास स्थल की बात करते हैं, लेकिन उनके व्यंग्य की मार चौतरफा होती है, जो हर स्थान के माहौल पर सटीक बैठती है। जैसे-

गांव की बेटी की इज्जत तो बचा लूं लेकिन
मुझे मुखिया न कहीं गांव से बाहर कर दे

दुनिया भर में फैले बाजारवाद पर राहत इंदौरी की लेखनी ने कमाल का व्यंग्य किया है। बहुत ही कम शब्दों में उन्होंने बाजारवाद के खोखलेपन का चित्रण किया है। उन्होंने बाजार की चमक-दमक के पीछे छिपे झूठ और फरेब को बेनकाब किया है। उन्हीं का एक शेर इसी पुस्तक से-

तू जो चाहे तो तेरा झूठ भी बिक सकता है
शर्त इतनी है कि सोने का तराजू रख ले

प्रदूषण आज की लाइलाज समस्या है। उसके लिए देश विदेश में चिंता भर जताई जा रही है, लेकिन उसका सटीक समाधान सामने नहीं आ रहा है। शायद यही वजह है कि यह समस्या चिंता का विषय बन गई है। शायर इंदौरी ने इस चिंता को अपनी शायरी में उतारा है-

मौत का जहर है फि़जाओं में
अब कहां जाके सांस ली जाए

शायरी से अलग शायर का अपना एक दर्द होता है, जिधर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। लोग अपने ही दर्द को शायरी में ढूंढते रहते हैं। इस बात को कहने का अंदाज देखें-

मुझसे दिल का हाल कोई कब पूछता है
ग़ज़लों की फ़रमाइश होती रहती है

जिंदगी के बारे में शायर ने जिस सच का उद्घाटन किया है, वह इतना सटीक है कि उसके जरिये मौत को भी समझने में मदद मिलती है। विवेचन की सहजता देखें-

जिंदगी तेरी आस रखती है
ये निंबोली मिठास रखती है
जिंदगी आग की सलीबों पर
कागजों के गिलास रखती है
मौत अपने बदन पे कुछ दिन तक
जिंदगी का लिबास रखती है

इसी तरह की 73 रचनाएं एक से बढ़कर एक हैं जो 100 पृष्ठों की पुस्तक ‘मेरे बाद’ में संग्रहीत हैं। 1 जनवरी 1960 को इंदौर में जन्मेी डॉ. राहत इंदौरी ने उर्दू में एमए और पीएचडी की। उन्हों ने 16 वर्षों तक उर्दू साहित्यत अध्यारपन और त्रैयमासिक पत्रिका ‘शाखें’ का 10 वर्षों तक संपादन किया। 50 से ज्यादा लोकप्रिय हिंदी फिल्मों और म्यूजिक अल्बमों के लिए गीत लेखन कर चुके हैं। तमाम प्रमुख ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लों को आवाज दी है।

अब तक उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित और समादृत हो चुके हैं। पिछले 40-50 वर्षों से लगातार देश-विदेश के मुशायरों और कवि सम्‍मेलनों में शिरकत की है। अब तक अमेरिका, कनाडा, इंग्लैं ड, सिंगापुर, मॉरीशस, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, ओमान, पाकिस्ता‍न, बांग्लातदेश, नेपाल आदि देशों की यात्रा कर चुके हैं और उन्हेंव देश-दुनिया के दर्जनों पुरस्काेरों से सम्मा्नित किया जा चुका है।

कठिन बात को साधारण तरीके से पेश करने की कला सीखनी हो तो यह पुस्तक पर्याप्त मार्गदर्शन करती है। इसमें साहित्य, संगीत और कला का अजूबा चित्रण है। पूरी पुस्तक भरपूर मनोरंजन तो करती ही है, हर शायरी अपना एक मजबूत संदेश भी छोड़ जाती है।

डॉ. कुंअर बेचैन के शब्दों में- अगर आपका मन शायरी में अल्फाडज कैसे झूमते हैं, ये देखने का हो; जज्बाात लफ्जों में कैसे बात करते हैं, ये जानने का हो; विचार को चारदीवारी से बाहर निकालकर सब तक कैसे पहुंचाया जाता है, ये समझने का हो; या फिर शायरी में शायरी से मुहब्ब त कैसे की जाती है, ये देखने का हो; दिल के खत पर दस्तहखत कैसे किए जाते हैं, ये हुनर सीखने का हो; सामान्य् बात को विशेष कैसे बनाया जाता है, इस प्रतिभा से परिचित होने का हो; या फिर विशेष और कठिन से कठिन बात को साधारण तरीके से कहने की कला सीखने का हो, तो ये सारी चीजें आपको एक ही व्येक्तित्व में मिल जाएंगी, जिन्हें हम जनाब राहत इंदौरी के नाम से जानते हैं।

जिसने भी उन्हें मंच पर कविता सुनाते हुए देखा है, वह अच्छी, तरह जानता है कि राहत भाई लफ्ज को केवल बोलते ही नहीं हैं, उसको चित्रित भी कर देते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि ये अजीम शायर लफ्जों के जरिये पेंटिंग कर रहा है। उनमें अपने भावों और विचारों के रंग भरकर सामने ला रहा है।

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