Israel Election 2026: इजराइल में चुनावी नतीजों के बाद बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर संकट गहराता दिखाई दे रहा है। उनकी पार्टी और सहयोगी दल बहुमत के आंकड़े से पीछे हैं। दूसरी ओर विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट और अरब पार्टियों के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाओं ने इजराइल की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। ऐसे में नेतन्याहू के सामने सरकार बचाने की चुनौती के साथ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के गिरफ्तारी वारंट का दबाव भी बना हुआ है।
Israel Election 2026: बहुमत से दूर नेतन्याहू, विपक्ष की बढ़ी उम्मीदें
इंफोपोस्ट/Israel Election 2026
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को चुनावी झटके के बाद अब इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं। इजराइल में चुनाव परिणाम आने के बाद किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में जरूर सामने आया है, लेकिन उसके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या नहीं है। यही वजह है कि इजराइल में नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
चुनावी गणित के अनुसार नेतन्याहू के गठबंधन के पास 53 सीटें हैं, जबकि बहुमत के लिए उन्हें आठ सीटों की जरूरत बताई जा रही है। दूसरी ओर गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला राजनीतिक समूह 48 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है। अरब पार्टियों के पास कुल 19 सीटें बताई गई हैं। इन आंकड़ों ने सरकार गठन के लिए कई संभावनाएं खोल दी हैं। हालांकि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और आपसी मतभेदों के कारण गठबंधन की राह आसान नहीं है।
गादी आइजेनकोट के सामने सरकार बनाने का अवसर
Israel Election 2026: गादी आइजेनकोट के लिए यह चुनाव परिणाम इजराइल की सत्ता में आने का बड़ा अवसर माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने नेतन्याहू पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि हमास के हमले और उसके बाद पैदा हुए हालात के लिए नेतन्याहू की सरकार जिम्मेदार है। इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगाए थे। ऐसे में चुनाव के बाद उन्हीं नेतन्याहू के साथ मिलकर सरकार बनाना उनके लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है।
आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चुनावी वादों और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाने की है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने नेतन्याहू की कार्यशैली और सरकार पर सवाल उठाए थे। अब यदि वह उन्हीं के साथ सत्ता में भागीदारी करते हैं तो उनके राजनीतिक विरोधियों को सवाल उठाने का मौका मिल सकता है। यही कारण है कि नेतन्याहू के साथ गठबंधन की संभावना कमजोर दिखाई दे रही है।
अरब पार्टियों के समर्थन से बदल सकता है सत्ता का समीकरण
Israel Election 2026: सरकार गठन में अरब पार्टियों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। उनके पास 19 सीटें हैं और वे स्पष्ट रूप से नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री बनने से रोकना चाहती हैं। अरब दलों की ओर से यह संकेत दिया गया है कि वे नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने के लिए विपक्षी गठबंधन को अपना समर्थन दे सकते हैं। हालांकि उनका समर्थन किस रूप में होगा, इस पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है।
अरब पार्टियों का मानना है कि गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर नेतन्याहू सरकार की नीतियां गंभीर सवालों के घेरे में हैं। उनके अनुसार गाजा में आम नागरिकों की मौत, भुखमरी और मानवीय संकट के लिए इजराइली नेतृत्व की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अरब दलों की राजनीतिक प्राथमिकताओं में नेतन्याहू को सत्ता से दूर रखना प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है। यही वजह है कि उनके 19 सांसदों का समर्थन नई सरकार के गठन में निर्णायक साबित हो सकता है।
रोटेशन सरकार का विकल्प भी चर्चा में
Israel Election 2026: इजराइल में सरकार गठन को लेकर एक अन्य विकल्प रोटेशन सरकार का भी सामने आया है। इस व्यवस्था के तहत नेतन्याहू और गादी आइजेनकोट बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद संभाल सकते हैं। हालांकि यह केवल चर्चा और संभावित राजनीतिक विकल्प के रूप में सामने आया है। अभी तक इस तरह के किसी समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरी ओर अरब पार्टियों के समर्थन से आइजेनकोट की सरकार बनाने की संभावना भी बनी हुई है। बताया जा रहा है कि अरब दल अपने 19 सांसदों का समर्थन देने के लिए तैयार हैं, ताकि नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री न बन सकें। इस समर्थन के आधार पर 48 सीटों वाले आइजेनकोट के राजनीतिक समूह को सरकार बनाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि उनकी पार्टी के भीतर भी अरब दलों के साथ गठबंधन को लेकर मतभेद बताए जा रहे हैं।
गाजा युद्ध और ICC का गिरफ्तारी वारंट बना बड़ी चुनौती
नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलों का एक महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी ICC का मामला भी है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने 21 नवंबर 2024 को इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और तत्कालीन रक्षा मंत्री के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। यह वारंट गाजा में युद्ध के दौरान कथित अपराधों से जुड़े आरोपों के आधार पर जारी किया गया था।
इन आरोपों में गाजा के आम नागरिकों को भुखमरी की स्थिति में पहुंचाना, युद्ध में भुखमरी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना, आम नागरिकों की हत्या से जुड़े अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध शामिल हैं। इन आरोपों के चलते नेतन्याहू की अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और कूटनीतिक गतिविधियों पर भी सवाल उठते रहे हैं। ICC के सदस्य देशों में गिरफ्तारी वारंट लागू करने की जिम्मेदारी होती है। भारत ICC का सदस्य नहीं है, इसलिए भारत में इस वारंट के आधार पर गिरफ्तारी की वैसी कानूनी बाध्यता नहीं बनती।
हंगरी यात्रा और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की कार्रवाई
नेतन्याहू की हंगरी यात्रा भी इस मामले में चर्चा का विषय बनी थी। हंगरी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का सदस्य होने के बावजूद नेतन्याहू की गिरफ्तारी नहीं कर पाया। इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की ओर से हंगरी के खिलाफ भी नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई। इससे ICC के गिरफ्तारी वारंट और सदस्य देशों की जिम्मेदारियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हुई।
नेतन्याहू के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें इजराइल में अपनी सरकार बचाने के लिए बहुमत जुटाना है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई भी राजनीतिक दबाव बढ़ा रही है। यदि वह प्रधानमंत्री पद से बाहर होते हैं तो उनकी राजनीतिक स्थिति और भविष्य को लेकर कई नए सवाल खड़े हो सकते हैं।
राष्ट्रपति की भूमिका और 10 नवंबर की अहम बैठक
इजराइल में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों की राष्ट्रपति से मुलाकात के जरिए यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि किस दल के पास सरकार बनाने के लिए कितना समर्थन है। पांच नवंबर को सरकार गठन के दावे और राजनीतिक समर्थन को लेकर तस्वीर स्पष्ट होने की संभावना जताई गई थी।
इसके बाद 10 नवंबर को नई संसद की 26वीं नेसेट की बैठक भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी बैठक में संसद के कामकाज और नेतृत्व से जुड़े कई राजनीतिक सवालों पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है। संसद अध्यक्ष के पद को लेकर भी राजनीतिक खींचतान जारी है। विपक्ष मौजूदा स्पीकर को हटाकर सदन के कामकाज पर नियंत्रण हासिल करना चाहता है। नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण की संभावित तारीख भी 10 नवंबर बताई गई है, हालांकि सरकार गठन की अंतिम स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है।
अमेरिका में भी नेतन्याहू के खिलाफ उठने लगी आवाजें
नेतन्याहू की मुश्किलें केवल इजराइल तक सीमित नहीं हैं। अमेरिका में भी उनके खिलाफ राजनीतिक आवाजें तेज होने की चर्चा है। इजराइल के विपक्षी नेता यायर गोलान ने नेतन्याहू पर आरोप लगाया है कि उन्होंने अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी का जरूरत से ज्यादा साथ देकर इजराइल के डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ संबंधों को नुकसान पहुंचाया। उनका कहना है कि अमेरिका के साथ इजराइल के संबंध किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
इस राजनीतिक विवाद का असर भविष्य में इजराइल को मिलने वाली अमेरिकी सहायता पर भी पड़ सकता है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की सत्ता आती है तो वाशिंगटन नेतन्याहू सरकार पर दबाव बढ़ा सकता है। यहां तक कि इजराइल को दी जाने वाली सैन्य सहायता सीमित करने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। इस तरह नेतन्याहू के सामने घरेलू राजनीति के साथ अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित रखने की चुनौती भी है।
ईरान की चेतावनी से बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव
इजराइल की आंतरिक राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ईरान के साथ तनाव भी एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुस्तफा खामेनेई ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान पर हमला किया गया तो खाड़ी देशों, इजराइल और अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है। इस बयान के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
ईरान की ओर से सैन्य तैयारियों को सक्रिय रखने की बात भी सामने आई है। लड़ाकू विमानों और एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय किए जाने का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC की विभिन्न इकाइयों को संभावित हमलों की स्थिति में कार्रवाई के लिए तैयार रहने की बात कही गई है। ऐसे हालात में इजराइल के लिए राजनीतिक अस्थिरता के साथ सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।
क्या इजराइल में फिर होंगे चुनाव?
इजराइल में दोबारा चुनाव होने की संभावना भी राजनीतिक चर्चाओं में शामिल है। हालांकि तत्काल नए चुनाव की स्थिति तभी बन सकती है जब कोई भी राजनीतिक समूह सरकार बनाने का दावा पेश करने में सफल नहीं होता। यदि नेतन्याहू, गादी आइजेनकोट और अरब पार्टियों के बीच कोई सरकार गठन का समझौता नहीं हो पाता है तो राजनीतिक संकट और गहरा सकता है। फिलहाल आइजेनकोट के पास सत्ता में आने का महत्वपूर्ण अवसर है।
अरब पार्टियों के लिए भी यह चुनाव परिणाम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। उनके पास नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने और इजराइल की राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर है। दूसरी तरफ नेतन्याहू अपने राजनीतिक सहयोगियों को एकजुट करने और बहुमत के लिए जरूरी आठ सीटें जुटाने की कोशिश में हैं। लेकिन गठबंधन की मौजूदा परिस्थितियां उनके लिए चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं।
नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर टिकी दुनिया की नजर
Israel Election 2026: अमेरिका और इजराइल की राजनीति में एक साथ आए इन घटनाक्रमों ने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को नया मोड़ दे दिया है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राजनीति में झटका लगने की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर नेतन्याहू अपनी सरकार बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इजराइल की संसद में सीटों का गणित, अरब पार्टियों की भूमिका, विपक्ष की रणनीति और राष्ट्रपति के सामने सरकार गठन का दावा आने वाले दिनों की राजनीति तय करेंगे।
नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि वह सत्ता से बाहर होते हैं तो उनकी राजनीतिक वापसी का रास्ता कितना आसान होगा, यह कहना मुश्किल है। उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट भी एक बड़ा दबाव बना हुआ है। 21 नवंबर 2024 को जारी वारंट की दूसरी वर्षगांठ नजदीक आने के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में उनकी गिरफ्तारी की परिस्थितियां बन सकती हैं। फिलहाल इजराइल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं तेज हैं और पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा।


