Gyanesh Kumar1: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर इस्तीफे की मांग, SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठते सवालों ने बहस तेज कर दी है।
Gyanesh Kumar1: इस्तीफे की मांग से बढ़ा विवाद
इंफोपोस्ट/Gyanesh Kumar1
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर Cockroach Janta Party ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था। पार्टी ने कहा कि मांग पूरी नहीं होने पर 2 अक्टूबर से मुंबई से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विपक्षी दलों और नागरिक समूहों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। आंदोलन के आयोजकों ने इसे मतदाता अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा मुद्दा बताया है। हालांकि इन आरोपों को चुनाव आयोग ने स्वीकार नहीं किया है।
जंतर मंतर पर 25 सितंबर को ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन भी हुआ। प्रदर्शन में योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और अन्य सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल हुए। इस बीच चुनाव आयोग के भीतर SIR से संबंधित निर्णयों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कई निर्णयों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR समेत उसके सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए।
Gyanesh Kumar1: चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का सवाल
SIR को लेकर सामने आए विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया है। रिपोर्टों में कहा गया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने मतदाता नाम जोड़ने और हटाने तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मामलों पर सवाल उठाए। इन आपत्तियों को सार्वजनिक किए जाने के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई। लेकिन आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि व्यक्तिगत स्तर पर उठाई गई चिंताओं को अंतिम संस्थागत निर्णय से अलग देखा जाना चाहिए और सभी निर्णयों पर सामूहिक सहमति रही है।
इसी विवाद के बीच ज्ञानेश कुमार के उत्तर प्रदेश के मेरठ और वाराणसी कार्यक्रम स्थगित किए गए। मेरठ में 25 सितंबर और वाराणसी में 28 सितंबर को युवाओं के साथ मतदाता जागरूकता कार्यक्रम प्रस्तावित थे। चुनाव आयोग के अनुसार दोनों कार्यक्रमों को स्थगित करने का निर्णय 21 सितंबर को लिया गया था और इसका SIR विवाद से संबंध नहीं था। आयोग ने कार्यक्रमों की तारीख में बदलाव के लिए स्थान की उपलब्धता, कार्यक्रमों और वरिष्ठ अधिकारियों की व्यस्तता जैसे प्रशासनिक कारणों का उल्लेख किया।
कार्यक्रमों के खर्च पर भी उठे सवाल
Gyanesh Kumar1: मेरठ के कार्यक्रम से जुड़े खर्च को लेकर भी सार्वजनिक बहस हुई। मीडिया रिपोर्टों में कार्यक्रम की व्यवस्थाओं के लिए बड़े टेंडर का उल्लेख किया गया। इन खर्चों को लेकर सवाल उठे कि कार्यक्रम स्थगित होने की स्थिति में वास्तविक खर्च कितना हुआ और किन मदों पर हुआ। दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि किसी कार्यक्रम का खर्च तभी होता है जब कार्यक्रम आयोजित किया जाए। इसलिए टेंडर की अनुमानित राशि और वास्तविक खर्च को अलग अलग समझना जरूरी है।
कार्यक्रम स्थगित होने को लेकर अलग अलग दावे सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में संभावित विरोध की आशंका का उल्लेख किया गया, जबकि चुनाव आयोग ने इसे कार्यक्रम स्थगित करने का आधिकारिक कारण नहीं माना। ऐसे में इस मामले में किसी एक कारण को अंतिम सत्य मानने के बजाय उपलब्ध आधिकारिक जानकारी और स्वतंत्र रिपोर्टों को अलग अलग देखना जरूरी है। यही स्थिति चुनाव आयोग से जुड़े दूसरे विवादों पर भी लागू होती है।
Gyanesh Kumar1: अदालतों में चुनाव आयोग से जुड़े मामले
पश्चिम बंगाल में चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आयोग और अदालत के बीच एक अलग विवाद सामने आया। कलकत्ता हाईकोर्ट ने रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस गुट को लिफाफा चुनाव चिन्ह दिए जाने के आधार पर आयोग से कारण बताने को कहा। इससे पहले यह चिन्ह इंडियन सेक्युलर फ्रंट के उम्मीदवारों द्वारा इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने सवाल उठाया कि उपलब्ध दूसरे चिन्हों के बावजूद यही चिन्ह क्यों चुना गया। मामले की सुनवाई आगे बढ़ी और आयोग से निर्णय का आधार स्पष्ट करने को कहा गया।
यह विवाद केवल एक चुनाव चिन्ह तक सीमित नहीं है। चुनाव आयोग की भूमिका पर उठने वाले सवालों का संबंध इस बात से भी है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान उसके प्रशासनिक और अर्ध न्यायिक निर्णय कितने स्पष्ट और पारदर्शी हैं। किसी भी संवैधानिक संस्था के मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसले और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। राजनीतिक दलों या सामाजिक संगठनों के आरोप अपने आप में न्यायिक निष्कर्ष नहीं होते।
SIR में नाम हटाने का बड़ा मुद्दा
SIR इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा हिस्सा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम बाहर हुए हैं। इन बदलावों के पीछे मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरे पंजीकरण और दूसरी तार्किक विसंगतियों जैसे कारण बताए गए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना हमेशा अंतिम रूप से मतदाता सूची से नाम हट जाना नहीं होता। दावे और आपत्तियों के जरिए पात्र मतदाता अपना नाम वापस शामिल कराने की प्रक्रिया में जा सकता है।
दिल्ली में SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस दिए जाने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार कई मामलों में पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान जानकारी के बीच अंतर के कारण नोटिस जारी किए गए। नोटिस मिलने का अर्थ अंतिम रूप से नाम हटना नहीं है। संबंधित मतदाता को दस्तावेज उपलब्ध कराने और निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि SIR की बहस में नाम हटने की संख्या के साथ बहाली और अपील की संख्या भी महत्वपूर्ण है।
Form 7 पर उठे तकनीकी सवाल
उत्तराखंड में Form 7 को लेकर सामने आया मामला SIR की तकनीकी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 95000 मतदाताओं के खिलाफ Form 7 आवेदन स्वतः तैयार हुए। ये आवेदन उन मामलों से जुड़े बताए गए हैं जिनमें तार्किक विसंगतियों की सुनवाई के बाद मतदाता अंतिम सूची के लिए पात्र नहीं पाए गए या सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए। राज्य में SIR के दौरान कुल करीब 173000 Form 7 आवेदन प्राप्त होने की जानकारी दी गई है।
यहां मुख्य सवाल यह है कि स्वचालित प्रक्रिया किस स्तर पर सक्रिय होती है और उसके बाद मानवीय सत्यापन कैसे होता है। Form 7 किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति या नाम हटाने की प्रक्रिया से जुड़ा है। इसलिए यदि तकनीकी प्रणाली के जरिए बड़ी संख्या में आवेदन तैयार होते हैं तो उनके आधार, सत्यापन और अंतिम निर्णय की जानकारी पारदर्शी होना जरूरी है। इससे गलत नाम हटने की आशंका और तकनीकी प्रक्रिया को लेकर भ्रम दोनों कम किए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मेधा रूपम मामला
ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद का एक अन्य पक्ष उनकी बेटी और नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़ा मामला है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत को रद्द करते हुए मुआवजे का आदेश दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को हाईकोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर रोक लगाई और अगले दिन अपने आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिरासत रद्द करने वाले हिस्से पर रोक नहीं लगाई गई थी।
इसके बाद Lawyers Association for Constitution ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की लिस्टिंग और सुनवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा। संगठन ने दावा किया कि मामला उस बेंच के सामने आया जिसके रोस्टर को लेकर सवाल उठते हैं और सुनवाई के दौरान लाइव कार्यवाही के म्यूट होने पर भी स्पष्टीकरण मांगा गया। हालांकि यह संगठन की आपत्ति है और इससे किसी न्यायाधीश के खिलाफ न्यायिक रूप से कोई दोष सिद्ध नहीं होता। अदालत की प्रक्रिया को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित न्यायिक आदेशों से ही स्पष्ट होगी।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखने पर चुनाव आयोग की पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता पर बहस तेज दिखाई देती है। एक तरफ SIR में बड़े पैमाने पर मतदाता रिकॉर्ड की समीक्षा हो रही है। दूसरी तरफ आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर आपत्तियों की खबरें आई हैं। अदालतों में चुनाव चिन्ह और मतदाता सूची से जुड़े मामले पहुंच रहे हैं। इन परिस्थितियों में आयोग के लिए केवल निर्णय लेना ही नहीं बल्कि निर्णय की प्रक्रिया और उसके आधार को स्पष्ट करना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों के जवाब में अपने निर्णयों को सर्वसम्मत बताया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कार्यक्रमों को लेकर उसने विरोध से जुड़ी अटकलों को खारिज करते हुए प्रशासनिक कारणों की बात कही है। इसलिए वर्तमान स्थिति में एक तरफ आरोप और दूसरी तरफ संस्थागत स्पष्टीकरण दोनों मौजूद हैं। पाठकों के लिए महत्वपूर्ण यह है कि किसी दावे को तथ्य मानने से पहले उसका आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायिक स्थिति देखी जाए।
मतदाता के लिए सबसे जरूरी सवाल
Gyanesh Kumar1: पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र आखिरकार मतदाता है। SIR में उसका नाम सही है या नहीं। किसी विसंगति के कारण नोटिस आया है या नहीं। Form 7 के जरिए उसके नाम पर कोई आपत्ति दर्ज हुई है या नहीं। और यदि नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है तो उसे वापस शामिल कराने की प्रक्रिया क्या है। इन सवालों के जवाब समय पर और स्पष्ट रूप से मिलना जरूरी है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के साथ उसकी जवाबदेही और पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण है। ज्ञानेश कुमार को लेकर इस्तीफे की मांग और आंदोलन अपनी जगह राजनीतिक गतिविधियां हैं। लेकिन SIR, मतदाता सूची, चुनाव चिन्ह और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े तथ्य अलग विषय हैं। इनका मूल्यांकन दस्तावेजों, आधिकारिक निर्णयों और अदालतों के आदेशों के आधार पर होना चाहिए। फिलहाल विवाद जारी है और आने वाले दिनों में SIR तथा चुनाव आयोग से जुड़े मामलों पर और निर्णय सामने आने की संभावना है।


