BRICS 26: भारत में जुटे दुनिया के बड़े नेता, लेकिन सवाल है कि इस सम्मेलन से भारत को क्या मिला? पढ़िए एक पड़ताल।
भारत में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन खत्म
INFOPOST/ BRICS 26
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!भारत में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन खत्म हो गया है। नई दिल्ली में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान समेत कई प्रमुख नेता एक मंच पर आए। यूएई, सऊदी अरब और मलेशिया जैसे देशों की भागीदारी ने भी इस सम्मेलन का दायरा बढ़ाया। ऐसे समय में जब दुनिया व्यापारिक तनाव, युद्ध और बदलती आपूर्ति श्रृंखलाओं से जूझ रही है, ब्रिक्स की यह बैठक अपने आप में महत्वपूर्ण रही।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भारत को इस आयोजन से वास्तव में क्या मिला? क्या यह केवल बड़े नेताओं की मौजूदगी और कूटनीतिक तस्वीरों तक सीमित रहा या भारत अपनी प्राथमिकताओं को समूह के साझा एजेंडे में शामिल कराने में सफल हुआ? नई दिल्ली घोषणा में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने, व्यापार और वित्तीय सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया गया।
BRICS 26: ग्लोबल साउथ पर भारत का जोर
भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स की गतिविधियां केवल शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं रहीं। घोषणा के मुताबिक भारत ने 30 शहरों में 400 से अधिक बैठकों और कार्यक्रमों का आयोजन किया। व्यापार, विज्ञान, तकनीक, कृषि, स्वास्थ्य और वित्त जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश की गई। भारत ने ब्रिक्स को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के रूप में पेश किया।
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी के मुताबिक नई दिल्ली घोषणा का मूल संदेश यही है कि वैश्विक व्यवस्था में ग्लोबल साउथ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार ब्रिक्स देशों ने मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत का संकेत दिया है। इस लिहाज से भारत की कोशिश केवल सम्मेलन आयोजित करने की नहीं, बल्कि विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को आगे बढ़ाने की रही।
सुरक्षा और वैश्विक संकट पर साझा रुख
नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया के संघर्ष पर भी चर्चा हुई। ब्रिक्स देशों ने हिंसा कम करने, अधिकतम संयम बरतने और बातचीत तथा कूटनीति के जरिए विवादों के समाधान पर जोर दिया। अमेरिकी टैरिफ और एकतरफा आर्थिक उपायों के असर को लेकर भी चिंता जताई गई। यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनाव से प्रभावित हैं।
भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी रही कि सम्मेलन में दहशतवाद, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को जगह मिली। भारत ने समुद्री कर्मचारियों के लिए आपात सहायता नेटवर्क और स्वास्थ्य से जुड़े शुरुआती चेतावनी तंत्र जैसी पहलों को भी आगे बढ़ाया। कृषि में जलवायु अनुकूलन और डिजिटल तकनीक से जुड़े नए सहयोग का रास्ता भी खुला।
उपलब्धि बड़ी, लेकिन परीक्षा अब शुरू
BRICS 26: फिर भी इसे भारत की निर्णायक कूटनीतिक जीत कहना जल्दबाजी होगी। ब्रिक्स में शामिल देशों के हित कई मामलों में अलग-अलग हैं। चीन और भारत के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, जबकि ईरान, यूएई और अन्य देशों के क्षेत्रीय हित भी अलग हैं। ऐसे समूह में साझा घोषणा हासिल करना उपलब्धि है, लेकिन घोषणाओं को जमीन पर उतारना उससे कहीं बड़ी चुनौती है।
इसलिए भारत के लिए BRICS 2026 की असली सफलता इस बात से तय होगी कि नई दिल्ली में बनी सहमति कितनी तेजी से व्यावहारिक सहयोग में बदलती है। सम्मेलन ने भारत को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में जरूर रखा और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देने का अवसर दिया। अब भारत के सामने चुनौती है कि वह इस कूटनीतिक पूंजी को व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे ठोस परिणामों में बदल सके। चीन को अगली अध्यक्षता सौंपे जाने के साथ भारत की अध्यक्षता का दौर समाप्त हुआ है, लेकिन इसकी उपलब्धियों की असली परीक्षा अब शुरू होगी।


