Shaping the future: नोएडा के सेक्टर-118 में रहने वाले इंजीनियर विकास झा के लिए सफलता का मतलब विदेश में मोटी तनख्वाह नहीं, बल्कि अपने गाँव के उन बच्चों की आँखों में चमक है जो पहली बार कहानी की किताब पलटते हैं। इंग्लैंड से लौटकर उन्होंने कॉर्पोरेट की दुनिया नहीं, शिक्षा की पगडंडी चुनी। साल 2016 से वह लगातार गरीब बच्चों तक गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पहुँचाने के मिशन में जुटे हैं, और उनकी ‘भविष्य संस्था’ आज सैकड़ों बच्चों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है।
Shaping the future: विकास झा के ‘भविष्य’ से भविष्य संवारती पहल
Shaping the future: हाल ही में ग्राम पर्थला खंजरपुर स्थित कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय के 500 से अधिक बच्चों को एक नई सौगात मिली है। विद्यालय परिसर में ‘भविष्य सामुदायिक पुस्तकालय’ का उद्घाटन किया गया है। यह सिर्फ अलमारी में सजी किताबें नहीं, बल्कि विकास झा के लिए एक अधूरे सपने को पूरा करने का जरिया है। वह बताते हैं, “यह लाइब्रेरी मैंने कोरोना काल में दिवंगत हुई अपनी बहन की याद में बनवाई है। उसका सपना था कि हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुँचे, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।” बहन के उसी सपने को साकार करने के लिए विकास पिछले 10 साल से जमीन पर काम कर रहे हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!रिक्शा से शुरू हुआ ‘शिक्षा अभियान’
विकास की कहानी किसी सरकारी योजना से नहीं, एक रिक्शे से शुरू हुई थी। 2016 में उन्होंने ‘रिक्शा पर शिक्षा अभियान’ चलाया, जिसके तहत वह खुद किताबें लेकर बस्तियों में जाते और बच्चों को पढ़ाते। धीरे-धीरे यह मुहिम ‘भविष्य संस्था’ में बदल गई। संस्था ने अपने 10 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह पुस्तकालय विद्यालय को समर्पित किया है।
16 जून से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है, और उससे ठीक पहले विद्यालय को दोहरी खुशी मिली है। पुस्तकालय के साथ-साथ तीन नई अत्याधुनिक कक्षाएं भी तैयार हो गई हैं। विद्यालय की अध्यापिका अर्चना पाण्डेय बताती हैं कि स्कूल में वर्तमान में 504 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। नई कक्षाओं में टाइल्स, आकर्षक शैक्षणिक पेंटिंग्स और नए पंखे लगाए गए हैं, जिससे बच्चों को बेहतर माहौल मिलेगा। जल्द ही यहाँ कंप्यूटर शिक्षा और अन्य गतिविधियाँ भी शुरू की जाएंगी।
क्या है इस लाइब्रेरी में खास?
‘भविष्य सामुदायिक पुस्तकालय’ को कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के स्तर को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यहाँ हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, पर्यावरण, सामान्य ज्ञान की किताबों के साथ-साथ बाल साहित्य, कहानी संग्रह, प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनी, चित्र पुस्तकें और नैतिक शिक्षा से जुड़ी पुस्तकें उपलब्ध हैं। मकसद साफ है – बच्चे सिर्फ पाठ्य पुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका ज्ञान का दायरा बढ़े। स्कूल खुलने के बाद बच्चे नियमित रूप से यहाँ बैठकर पढ़ सकेंगे।
कोरोना काल ने विकास से उनकी बहन को छीन लिया, पर उनका सपना छीन नहीं पाया। आज जब पर्थला खंजरपुर के बच्चे लाइब्रेरी में बैठकर एपीजे अब्दुल कलाम की जीवनी पढ़ते हैं या प्रेमचंद की कहानियों में खो जाते हैं, तो लगता है कि एक इंजीनियर ने वाकई ‘भविष्य’ गढ़ दिया है।
विकास झा कहते हैं, “नौकरी विदेश में की, पर सुकून अपने लोगों के बीच काम करके मिलता है।” इंग्लैंड से लौटे इस इंजीनियर ने साबित कर दिया कि बदलाव के लिए बड़ी इमारतें नहीं, बड़ा दिल चाहिए। सेक्टर-118 के एक फ्लैट से शुरू हुई यह पहल आज शहर के हजारों घरों तक रोशनी पहुँचा रही है। और यह बस शुरुआत है – क्योंकि जहाँ किताबें पहुँचती हैं, वहाँ भविष्य खुद-ब-खुद बनने लगता है।



Shaping the future: नोएडा के सेक्टर-118 में रहने वाले इंजीनियर विकास झा के लिए सफलता का मतलब विदेश में मोटी तनख्वाह नहीं, बल्कि अपने गाँव के उन बच्चों की आँखों में चमक है जो पहली बार कहानी की किताब पलटते हैं। इंग्लैंड से लौटकर उन्होंने कॉर्पोरेट की दुनिया नहीं, शिक्षा की पगडंडी चुनी। साल 2016 से वह लगातार गरीब बच्चों तक गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पहुँचाने के मिशन में जुटे हैं, और उनकी ‘भविष्य संस्था’ आज सैकड़ों बच्चों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है।