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Drinking Water Crisis: बस कहीं से साफ पानी मिल जाए …

Shrikant Singh June 1, 2026
Drinking Water Crisis

Drinking Water Crisis: भीषण गर्मी और जल संकट के बीच भारत की पारंपरिक प्याऊ संस्कृति फिर जीवित हो रही है। जानिए मिट्टी के मटके के वैज्ञानिक लाभ, जल संरक्षण का महत्व और एबीवीपी के सकोरा अभियान की पूरी कहानी।

Drinking Water Crisis: फिर जीवित हो रही है ‘प्याऊ संस्कृति’

Drinking Water Crisis: देशभर में भीषण गर्मी और बढ़ते जल संकट के बीच भारत की सदियों पुरानी ‘प्याऊ संस्कृति’ एक बार फिर चर्चा में है। जहां एक ओर कई राज्यों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है और पेयजल संकट गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन शहरों से लेकर गांवों तक मिट्टी के मटकों में पानी रखकर राहगीरों, पशु-पक्षियों और जरूरतमंद लोगों की प्यास बुझाने का कार्य कर रहे हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी के घड़े में पानी को ठंडा रखने की परंपरा केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है। मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों से पानी की न्यूनतम मात्रा लगातार वाष्पित होती रहती है, जिससे प्राकृतिक रूप से जल ठंडा बना रहता है। यही कारण है कि तेज गर्मी में भी मटके का पानी शीतल और ताजगीभरा महसूस होता है।

जल संकट के बीच बढ़ी प्याऊ की आवश्यकता

देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से जल संकट की अनेक तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जल संरक्षण और पेयजल आपूर्ति को लेकर विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में लोगों की जरूरतें अब भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।

ऐसे समय में निजी संस्थाएं, सामाजिक संगठन और स्थानीय नागरिक सार्वजनिक स्थानों पर मटके रखकर पारंपरिक प्याऊ व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं।

भारतीय संस्कृति की अमूल्य विरासत है प्याऊ परंपरा

Drinking Water Crisis: भारतीय समाज में जलदान को सदैव पुण्य का कार्य माना गया है। प्राचीन काल से ही यात्रियों और राहगीरों के लिए पेयजल की व्यवस्था करने की परंपरा रही है। गांवों की चौपाल, मंदिरों के बाहर, पेड़ों की छांव और प्रमुख मार्गों पर मिट्टी के मटके रखे जाते थे, जहां कोई भी व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के पानी पी सकता था।

धार्मिक ग्रंथों में भी जलदान को विशेष महत्व दिया गया है। ऋग्वेद में जल को सुख और जीवन का आधार बताया गया है, जबकि महाभारत के अनुशासन पर्व में जलदान को श्रेष्ठ दान की श्रेणी में रखा गया है। राजस्थान के पनघट, हरियाणा की बावड़ियां और मारवाड़ की प्याऊ इसी सांस्कृतिक परंपरा के विभिन्न स्वरूप रहे हैं।

इतिहासकारों के अनुसार मौर्य सम्राट अशोक और सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में यात्रियों के लिए पेयजल की विशेष व्यवस्थाएं की जाती थीं। मध्यकाल में संतों और समाजसेवियों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता से पहले ग्रामीण भारत में लगभग हर प्रमुख चौराहे पर मटकों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराया जाता था।

मिट्टी के मटके की शीतलता के पीछे है विज्ञान

मिट्टी के घड़े में पानी ठंडा रहने का कारण पूरी तरह वैज्ञानिक है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों से जल की अल्प मात्रा लगातार वाष्पित होती रहती है। वाष्पीकरण की इस प्रक्रिया में ऊष्मा का अवशोषण होता है, जिससे घड़े के भीतर का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा हो जाता है।

इसके अलावा मिट्टी स्वयं एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह कार्य करती है। पारंपरिक रूप से तांबे या पीतल के पात्रों से पानी पीने की प्रथा भी स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी मानी जाती रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक की बोतलों में लंबे समय तक रखा गया पानी गर्मी के प्रभाव से रासायनिक तत्वों के संपर्क में आ सकता है, जबकि मिट्टी के घड़े में संग्रहित पानी पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से ठंडा और सुरक्षित रहता है।

आधुनिक जीवनशैली के कारण कमजोर हुई परंपरा

विशेषज्ञ मानते हैं कि तेजी से हुए शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने प्याऊ संस्कृति को काफी प्रभावित किया है। सार्वजनिक स्थानों पर सामुदायिक गतिविधियों का दायरा कम हुआ है और लोगों की निर्भरता बोतलबंद पानी तथा व्यावसायिक पेयजल सेवाओं पर बढ़ी है।

इसके साथ ही मटके के पानी को लेकर स्वच्छता संबंधी कई भ्रांतियां भी समाज में फैल गईं, जबकि अनेक वैज्ञानिक अध्ययन पारंपरिक जल संग्रह प्रणालियों को पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी बताते हैं।

दिल्ली-एनसीआर में पेयजल संकट बना चुनौती

दिल्ली-एनसीआर के कई क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम जैसे शहरों में अनेक स्थानों पर भूजल की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग पीने के पानी के लिए निजी सप्लाई और पैकेज्ड वाटर पर निर्भर हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि भूजल दोहन की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर हो सकता है।

जल संरक्षण और सामाजिक सहभागिता की जरूरत

पर्यावरणविदों का मानना है कि जल संकट केवल संसाधनों की कमी का नहीं बल्कि सामुदायिक चेतना का भी विषय है। यदि स्थानीय निकाय, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करें और जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दें, तो स्थिति में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

स्कूलों और कॉलेजों में भी विद्यार्थियों को जल संरक्षण और पारंपरिक जल संस्कृति के महत्व के बारे में जागरूक किए जाने की आवश्यकता है।

एबीवीपी का ‘सकोरा अभियान’ बना उदाहरण

बढ़ते जल संकट और भीषण गर्मी को देखते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने देशभर में ‘सकोरा अभियान’ शुरू किया है। अभियान के तहत प्रमुख चौराहों, सार्वजनिक स्थलों और पार्कों में मिट्टी के मटके तथा सकोरे रखे जा रहे हैं, जिनमें नियमित रूप से पानी भरने की व्यवस्था भी की जा रही है।

एबीवीपी के नोएडा संगठन मंत्री शुभम भाटी के अनुसार अभियान के तहत शहर में 100 से अधिक स्थानों पर मटके और सकोरे स्थापित किए जा चुके हैं। इसका लाभ राहगीरों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को भी मिल रहा है।

निष्कर्ष

Drinking Water Crisis: भीषण गर्मी, घटते भूजल स्तर और बढ़ते पर्यावरणीय संकट के दौर में भारत की पारंपरिक प्याऊ संस्कृति केवल एक सांस्कृतिक विरासत नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समाज और प्रशासन मिलकर इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें, तो यह न केवल लोगों की प्यास बुझाएगी बल्कि जल संरक्षण और सामुदायिक सहयोग की भावना को भी मजबूत करेगी।

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