Nuclear Missile: अंतरमहाद्वीपीय 18 हजार किलोमीटर रेंज की परमाणु मिसाइलों ने वैश्विक सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। जानिए Russia, United States और China की मिसाइल क्षमता और दुनिया पर इसका असर।
Nuclear Missile: दुनिया कितनी सुरक्षित, कितना खतरा?
इंफोपोस्ट न्यूज़डेस्क/Nuclear Missile
दुनिया एक ऐसे दौर में खड़ी है जहां तकनीक और ताकत का संतुलन लगातार बदल रहा है। परमाणु हथियारों की होड़ में अब सबसे ज्यादा चर्चा उन मिसाइलों की हो रही है, जिनकी मारक क्षमता 18,000 किलोमीटर तक बताई जाती है। यह दूरी इतनी अधिक है कि एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक सीधा हमला संभव हो जाता है। सवाल उठता है—ऐसी क्षमता किसके पास है और इसका वैश्विक सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है?
सबसे पहले बात करें Russia की। रूस ने अपनी अत्याधुनिक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) RS-28 Sarmat को विकसित किया है, जिसे NATO “Satan-2” के नाम से भी जानता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस मिसाइल की रेंज करीब 18,000 किलोमीटर तक हो सकती है। यह मिसाइल कई परमाणु वॉरहेड्स को एक साथ ले जाने में सक्षम है और आधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों को भेदने के लिए डिजाइन की गई है। रूस की यह क्षमता उसे “ग्लोबल स्ट्राइक” की ताकत देती है, यानी दुनिया के लगभग किसी भी हिस्से को निशाना बनाया जा सकता है।
अमेरिका भी इस दौड़ में पीछे नहीं
वहीं United States भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। अमेरिका के पास Minuteman III जैसी ICBM प्रणाली है, जिसकी रेंज 13,000 से 15,000 किमी तक मानी जाती है। हालांकि यह 18,000 किमी के स्तर तक नहीं पहुंचती, लेकिन इसकी सटीकता और तैनाती क्षमता इसे बेहद खतरनाक बनाती है। अमेरिका अब नई पीढ़ी की मिसाइल प्रणालियों पर काम कर रहा है, जो भविष्य में और अधिक दूरी और मारक क्षमता हासिल कर सकती हैं।
एशिया की बात करें तो China ने भी अपनी DF-41 मिसाइल के जरिए लंबी दूरी की क्षमता विकसित की है। इसकी रेंज 12,000 से 15,000 किमी के बीच मानी जाती है। चीन लगातार अपनी परमाणु ताकत को आधुनिक बना रहा है, जिससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बदल रहा है।
भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा
भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। India की अग्नि-V मिसाइल लगभग 5,000 से 8,000 किमी तक मार कर सकती है, जबकि अग्नि-VI पर काम जारी है, जिसके बारे में माना जा रहा है कि इसकी रेंज और अधिक हो सकती है। हालांकि भारत की नीति “नो फर्स्ट यूज़” पर आधारित है, जो इसे अन्य परमाणु शक्तियों से अलग बनाती है।
इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इतनी लंबी दूरी की मिसाइलें दुनिया को ज्यादा सुरक्षित बनाती हैं या खतरे को बढ़ाती हैं? रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी मिसाइलें “डिटरेंस” यानी रोकथाम का काम करती हैं। जब देशों के पास एक-दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता होती है, तो युद्ध की संभावना कम हो जाती है। लेकिन दूसरी ओर, यह हथियारों की दौड़ को भी तेज करती हैं, जिससे तनाव बढ़ता है।
आज की वैश्विक राजनीति में 18,000 किमी रेंज जैसी मिसाइलें सिर्फ सैन्य ताकत का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे रणनीतिक दबाव और कूटनीतिक शक्ति का भी अहम हिस्सा बन चुकी हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या दुनिया इस दौड़ को नियंत्रित कर पाएगी या यह प्रतिस्पर्धा और अधिक खतरनाक मोड़ लेगी।


