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Thakur Vishwanath Shahdeo: जिसने अंग्रेजों को रांची से भगाया

infopost December 28, 2025
Thakur Vishwanath Shahdeo

Thakur Vishwanath Shahdeo: 1857 के स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव की कहानी बहुत ही प्रेरणाप्रद है। बड़कागढ़ इस्टेट, ब्रिटिश अत्याचार, फांसी और आज़ादी के बाद भी वंशजों को न्याय न मिलने का संघर्ष बहुत कुछ जानने की जिज्ञासा पैदा करता है। जबकि उन्होंने अंग्रेजों को रांची से भगा दिया था।

Thakur Vishwanath Shahdeo: जिनके वंशज आज भी कर रहे हैं संघर्ष

इंफोपोस्ट न्यूज

Thakur Vishwanath Shahdeo: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायकों में शामिल अमर शहीद ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव का नाम झारखंड और छोटा नागपुर के इतिहास में गौरव का प्रतीक है। अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देने वाले इस वीर योद्धा ने देश की आज़ादी के लिए अपनी पूरी रियासत और जीवन बलिदान कर दिया। लेकिन आज़ादी के दशकों बाद भी उनके वंशज न्याय और अधिकारों के लिए भटक रहे हैं।

ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव का जन्म 12 अगस्त 1817 को बड़कागढ़ इस्टेट की राजधानी सतरंगी (वर्तमान रांची, झारखंड) में हुआ था। उनके पिता ठाकुर रघुनाथ शाहदेव और माता चानेश्वरी देवी थीं। बचपन से ही उनके भीतर देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध की भावना प्रबल थी।

बड़कागढ़ इस्टेट और ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह

1840 में पिता के निधन के बाद विश्वनाथ शाहदेव बड़कागढ़ इस्टेट के उत्तराधिकारी बने। अंग्रेजों के अत्याचार, भारी लगान और दमनकारी नीतियों के खिलाफ उन्होंने ‘मुक्ति वाहिनी’ नामक सेना का गठन किया। छोटा नागपुर क्षेत्र में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध यह संगठित आंदोलन तेजी से फैलने लगा।

1855 में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के नेतृत्व में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। छोटा नागपुर को स्वतंत्र राज्य घोषित कर राजधानी सतरंगीगढ़ से हटिया स्थानांतरित कर दी गई।
इस आंदोलन में पांडेय गणपत राय, टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी, जयमंगल सिंह, नादिर अली खान सहित कई क्रांतिकारी शामिल हुए।

गद्दारी, गिरफ्तारी और फांसी

चतरा से लौटते समय विश्वनाथ शाहदेव अपने परिचित जगतपाल सिंह के घर रुके, जिसने गद्दारी करते हुए अंग्रेजों को सूचना दे दी। तीन दिन के संक्षिप्त ट्रायल के बाद 16 अप्रैल 1858 को उन्हें वर्तमान रांची जिला स्कूल के सामने स्थित कदंब के पेड़ पर फांसी दे दी गई। उनका शव छह दिनों तक पेड़ से लटकाए रखा गया। 21 अप्रैल 1858 को पांडेय गणपत राय को भी उसी स्थान पर फांसी दी गई।

ब्रिटिश हुकूमत ने विश्वनाथ शाहदेव की 91 गांवों की जमींदारी जब्त कर ली और बड़कागढ़ किले को तोप से उड़ा दिया। पूरी संपत्ति को ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउंसिल’ के नाम दर्ज कर दिया गया।

आजादी के बाद भी नहीं लौटी संपत्ति

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद होने के साथ ही ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउंसिल’ का अस्तित्व समाप्त हो गया था। इसके बावजूद बड़कागढ़ इस्टेट न तो वंशजों को लौटाई गई और न ही उसका कोई मुआवजा दिया गया।

फांसी के समय उनके पुत्र कपिलनाथ शाहदेव मात्र एक वर्ष के थे। उनकी पत्नी बानेश्वरी कुंवर जंगलों में शरण लेने को मजबूर हुईं। 1872 में कोलकाता स्थित विलियम फोर्ट में जमींदारी वापसी की मांग की गई, जिसे खारिज कर दिया गया। बाद में केवल 30 रुपये मासिक पेंशन और 1880 में रांची के धुर्वा क्षेत्र में एक कच्चा मकान दिया गया।

सरकारी रिकॉर्ड में दबा न्याय

1957 में रांची आयुक्त ने 1.59 लाख रुपये भुगतान की अनुशंसा की थी। 1989, 1999 और उसके बाद कई बार यह मामला सरकार और विधान परिषद में उठा। 2013 और 2022 में झारखंड हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं, जो अब भी लंबित हैं।

दिसंबर 2021 में वंशज लाल अमोद नाथ शाहदेव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर न्याय की मांग की। पीएमओ ने झारखंड सरकार को कार्रवाई के निर्देश दिए, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।

आज भी जारी न्याय की लड़ाई

2025 में झारखंड विधानसभा में यह मुद्दा फिर उठा, लेकिन सरकार ने अदालत में मामला लंबित होने का हवाला देकर जवाब टाल दिया। ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिला, लेकिन उनके परिवार को आज़ादी के बाद भी वह सम्मान और अधिकार नहीं मिल सके जिसके वे हकदार हैं।

Thakur Vishwanath Shahdeo: यह मामला न केवल एक परिवार का संघर्ष है, बल्कि भारत के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की कहानी भी है।

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